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गड्ढे से निकले भेरुजी, चमड़े की खाल के जल से स्नान और दाल-बाटी लड्डू का भोग—नीमच सिटी में रंग तेरस पर निकली परंपरागत गैर

Mahendra Upadhyay
3 Min Read

नीमच। महेन्द्र उपाध्याय। पुराने शहर नीमच सिटी में मंगलवार को रंग तेरस का पर्व पारंपरिक आस्था, उल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया। इस अवसर पर वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए माहेश्वरी मोहल्ले से भेरुजी की गैर निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु और युवा वर्ग शामिल हुए।सागर मंथन रंग तेरस के मौके पर विशेष परंपरा के तहत भूमिगत विराजमान भेरुजी की प्रतिमा को गड्ढे से बाहर निकाला गया। इसके बाद बकरे की चमड़े की खाल में भरे पानी से उनका विधिवत स्नान कराया गया। स्नान के पश्चात पूजा-अर्चना कर भेरुजी को दाल-बाटी और लड्डू का विशेष भोग अर्पित किया गया। यह अनूठी परंपरा क्षेत्र में आस्था और लोकसंस्कृति का प्रमुख प्रतीक मानी जाती है।गैर माहेश्वरी मोहल्ला से प्रारंभ होकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरते हुए पुनः वहीं आकर संपन्न हुई। गैर के दौरान भेरुजी की प्रतिमा को ठेले पर विराजित कर नगर भ्रमण कराया गया। इस दौरान जोशी मोहल्ला स्थित खेड़ापति बालाजी मंदिर में पूजा-अर्चना और भोग लगाने के बाद गैर आगे बढ़ी। मार्ग में श्रद्धालुओं ने गुलाल उड़ाकर और पारंपरिक रंगों से होली खेलते हुए उत्सव का आनंद लिया।गैर में शामिल युवाओं की टोली विशेष आकर्षण का केंद्र रही। वे बकरे की खाल में पानी भरकर भेरुजी के स्नान के साथ-साथ उपस्थित लोगों पर भी पानी का छिड़काव करते नजर आए। इस अनोखी परंपरा ने माहौल को और भी उत्साहपूर्ण बना दिया।माहेश्वरी समाज के राकेश बाहेती ने सागर मंथन को बताया कि यह परंपरा पिछले लगभग 75 वर्षों से लगातार चली आ रही है। भेरुजी वर्षभर गड्ढे में ही विराजमान रहते हैं और केवल होली के अवसर पर ही उन्हें बाहर निकालकर स्नान, पूजन और भोग लगाया जाता है। इसके बाद नवरात्रि में पुनः विधि-विधान से उन्हें उसी गड्ढे में स्थापित कर दिया जाता है।उन्होंने कहा कि इस परंपरा को नई पीढ़ी भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है। रंग तेरस पर निकली यह गैर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है,बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए रखने का माध्यम है।

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