नीमच। महेन्द्र उपाध्याय। शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में रविवार 15 मार्च को दोपहर गांधी वाटिका प्रांगण में जिले के शिक्षकों और अध्यापकों की एक आवश्यक बैठक आयोजित की गई। बैठक में विभिन्न शिक्षक संगठनों के पदाधिकारियों और बड़ी संख्या में अध्यापकों ने भाग लेकर इस विषय पर गहन चर्चा की और सरकार से पुनर्विचार की मांग की।बैठक में उपस्थित शिक्षकों ने सागर मंथन को बताया कि प्रदेश में पिछले लगभग 30 वर्षों से हजारों शिक्षक और अध्यापक शासकीय विद्यालयों में निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन शिक्षकों ने न केवल नियमित रूप से विद्यालयों में कार्य किया है, बल्कि बेहतर परीक्षा परिणाम भी देकर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों पर अब शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य करना उचित नहीं है।बैठक में वक्ताओं ने कहा कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार देशभर में शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित किए जाने का विषय सामने आया है, जिसके चलते मध्यप्रदेश में भी इसे लागू करने की चर्चा चल रही है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार यह व्यवस्था वर्ष 2009 से लागू की जानी थी। प्रदेश में वर्ष 1998 से लेकर अब तक जो भी शिक्षक भर्तियां हुई हैं, वे मध्यप्रदेश शासन द्वारा समय-समय पर जारी नियमों और आदेशों के अनुसार ही की गई हैं।शिक्षकों का कहना है कि वर्ष 2009 से पहले नियुक्त और वर्तमान में सेवाएं दे रहे अध्यापकों पर टीईटी की अनिवार्यता लागू करना न्यायसंगत नहीं होगा। इस संबंध में बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री से निवेदन किया जाएगा कि अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश शासन भी इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर करे, ताकि वर्षों से कार्यरत शिक्षकों को राहत मिल सके।बैठक में यह भी कहा गया कि यदि सरकार द्वारा शिक्षकों के हित में उचित कदम नहीं उठाया गया तो मजबूरन अध्यापकों और शिक्षकों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ सकता है।बैठक में कंवरलाल नागदा,मनीष पुरोहित, भारत राठौर,विनोद राठौर,संजय नागोरी, परसराम रावत,समर्थ गोस्वामी, सईद खान सहित विभिन्न शिक्षक संगठनों के पदाधिकारी तथा जिले के सैकड़ों शिक्षक और अध्यापक उपस्थित रहे।







