नीमच। महेन्द्र उपाध्याय। शिक्षकों की मांगों और आंदोलनों को प्रमुखता से उठाने वाली मीडिया ने इस बार शिक्षा व्यवस्था की दूसरी तस्वीर भी सामने रखी है। विद्यालय परिसर और शासकीय कार्य के दौरान रील बनाने का मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद जब विभिन्न शासकीय विद्यालयों का जायजा लिया गया तो कहीं शिक्षक कक्षाओं से नदारद मिले,तो कहीं मोबाइल फोन में व्यस्त नजर आए। बच्चों को बिना मार्गदर्शन के कक्षाओं में बैठे देख शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक की गरिमा और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। मामले को गंभीरता से लेते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने वायरल वीडियो के आधार पर दो शिक्षिकाओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है, जबकि अन्य वायरल वीडियो में दिखाई देने वाले शिक्षकों की भी जांच शुरू कर दी गई है। साथ ही सभी शिक्षकों को स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि विद्यालय परिसर अथवा किसी भी शासकीय कार्य के दौरान रील या सोशल मीडिया वीडियो बनाना सेवा आचरण के विपरीत माना जाएगा और भविष्य में ऐसा पाए जाने पर कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाएगी।गौरतलब है कि हाल ही में शिक्षक संगठन पात्रता परीक्षा से राहत, सेवा अवधि की गणना नियुक्ति तिथि से किए जाने, पुरानी पेंशन सहित विभिन्न मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे। उच्च न्यायालय से जुड़े मुद्दों पर भी शिक्षकों ने अपने अधिकार, सम्मान और गरिमा की बात प्रमुखता से उठाई थी। ऐसे में अब यह मामला भी चर्चा का विषय बन गया है कि अधिकारों के साथ-साथ सेवा आचरण, अनुशासन और विद्यार्थियों के प्रति जवाबदेही का पालन भी उतनी ही गंभीरता से होना चाहिए। शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि शिक्षकों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही को लेकर समय-समय पर प्रभावी मूल्यांकन और अनुशासनात्मक व्यवस्था लागू हो, तो इससे शिक्षा की गुणवत्ता और समाज का विश्वास दोनों मजबूत होंगे। वहीं यह घटनाक्रम इस बात का भी संदेश देता है कि मीडिया केवल शिक्षकों की मांगों और आंदोलनों को ही प्रमुखता नहीं देती, बल्कि सार्वजनिक दायित्वों के निर्वहन में होने वाली कमियों और लापरवाहियों को भी समान रूप से सामने लाना अपना दायित्व समझती है।







