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रील की दीवानगी या शिक्षक की गरिमा पर सवाल? स्कूल परिसर से सड़क तक वायरल वीडियो ने छेड़ी बहस, शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर टिकी निगाहें

Mahendra Upadhyay
5 Min Read

नीमच।महेन्द्र उपाध्याय। जिले के धनेरिया कला शासकीय हाई स्कूल की एक शिक्षिका का विद्यालय परिसर में बारिश के दौरान फिल्मी गीत पर बनाया गया रील वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के बाद शिक्षा जगत में नई बहस छिड़ गई है। वायरल वीडियो में शिक्षिका स्कूल परिसर में फिल्मी अंदाज में रील बनाती दिखाई दे रही हैं। वीडियो सामने आने के बाद लोग केवल इसी घटना पर नहीं, बल्कि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही उन शिक्षिकाओं के वीडियो पर भी सवाल उठा रहे हैं, जिनमें वे कभी सरकारी स्कूल परिसर, कभी सार्वजनिक सड़कों और अन्य स्थानों पर फिल्मी गीतों पर रील बनाकर इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर साझा करती दिखाई देती हैं।सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इन वीडियो को लेकर नागरिकों का कहना है कि शिक्षक समाज का आदर्श होता है। ऐसे में यदि विद्यालय परिसर या किसी सरकारी दायित्व के निर्वहन के दौरान रील बनाने जैसी गतिविधियां होती हैं तो यह शिक्षक की गरिमा और सेवा आचरण से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि कोई शिक्षक जनगणना, सर्वेक्षण या अन्य शासकीय कार्य के दौरान अथवा शासकीय परिसर में सोशल मीडिया के लिए वीडियो बनाने में व्यस्त दिखाई दे तो क्या यह उसकी जिम्मेदारियों के अनुरूप माना जा सकता है।इन दिनों सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने की होड़ लगातार बढ़ रही है। अधिक लाइक, व्यूज और फॉलोअर्स की चाहत में रील बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है। यही कारण है कि अब यह प्रवृत्ति सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर शिक्षकों तक भी पहुंचती दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि शिक्षक केवल पढ़ाने वाला कर्मचारी नहीं बल्कि विद्यार्थियों के लिए अनुशासन, संस्कार और नैतिक मूल्यों का सबसे बड़ा उदाहरण होता है। यदि शिक्षक स्वयं विद्यालय परिसर अथवा सरकारी दायित्वों के दौरान रील बनाने को प्राथमिकता देता हुआ दिखाई देगा तो विद्यार्थियों के मन में क्या संदेश जाएगा, यह भी विचारणीय विषय है।सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर दो तरह की राय सामने आ रही है। एक वर्ग इसे शिक्षकों की निजी अभिव्यक्ति का अधिकार बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग मानता है कि निजी अभिव्यक्ति और सरकारी सेवा की मर्यादा के बीच स्पष्ट सीमा होनी चाहिए। लोगों का कहना है कि यदि वीडियो अवकाश के समय निजी स्थान पर बनाया जाए तो वह अलग विषय हो सकता है, लेकिन विद्यालय परिसर, सरकारी कार्यालय, सड़क पर शासकीय दायित्व के दौरान अथवा किसी सरकारी कार्य के समय बनाए गए वीडियो की जांच होना आवश्यक है।लोगों ने पिछले वर्ष का वह घटनाक्रम भी याद दिलाया है, जब शिक्षकों की नियुक्ति और पात्रता से जुड़े न्यायालय के निर्णय के विरोध में प्रदेशभर में शिक्षक संगठनों ने आंदोलन किया था और न्यायालय के आदेश के विरुद्ध अपनी बात रखने के लिए सड़कों पर उतर आए थे। उस समय शिक्षकों ने अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा की बात कही थी। अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ऐसे वीडियो के बाद नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि जब शिक्षक अपने अधिकारों और सम्मान को लेकर इतने सजग हैं तो क्या उन्हें अपने आचरण, सेवा नियमों और सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति भी उतनी ही गंभीरता नहीं दिखानी चाहिए।फिलहाल शिक्षा विभाग की ओर से इस वायरल वीडियो को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। हालांकि सोशल मीडिया पर लगातार यह मांग उठ रही है कि यदि विद्यालय परिसर, सरकारी संपत्ति या शासकीय कार्य के दौरान नियमों के विपरीत रील बनाई गई है तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर तथ्यों के आधार पर आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई की जाए। लोगों का मानना है कि इससे भविष्य में सरकारी विद्यालयों की गरिमा बनी रहेगी और सरकारी कर्मचारियों के लिए भी स्पष्ट संदेश जाएगा कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता से अधिक महत्वपूर्ण उनकी सेवा जिम्मेदारियां और सार्वजनिक आचरण हैं।अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग पर टिकी हैं कि वायरल वीडियो की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाती है या नहीं। यदि सेवा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो विभाग क्या कार्रवाई करता है,फिलहाल इतना तय है कि इस पूरे घटनाक्रम ने सोशल मीडिया की बढ़ती रील संस्कृति और शिक्षक की गरिमा के बीच संतुलन को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।

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