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खामोशी की भाषा में गूंजा जज्बा:इशारों में बोले हौसले,20 वें नववर्ष मिलन में मूकबधिरों ने रचा प्रेरणा का इतिहास

Mahendra Upadhyay
3 Min Read

नीमच। महेन्द्र उपाध्याय।जहां शब्द थम जाते हैं, वहां हौसले बोलते हैं नीमच में आयोजित मूकबधिर संघ का 20वां नववर्ष मिलन समारोह इसका जीता-जागता उदाहरण बनकर सामने आया। शहर के वात्सल्य भवन में रविवार को आयोजित इस अनूठे आयोजन में मध्यप्रदेश,राजस्थान, गुजरात,सागर मंथन सहित कई राज्यों से आए सदस्यों ने भाग लेकर यह साबित कर दिया कि शारीरिक अक्षमता कभी भी सपनों और उत्साह की राह में बाधा नहीं बन सकती।इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि यहां सब कुछ इशारों में हुआ,बातचीत भी, प्रतियोगिताएं भी और जीत की खुशियां भी। ना बोल पाने और ना सुन पाने के बावजूद प्रतिभागियों का आत्मविश्वास और जोश किसी भी सामान्य आयोजन से कम नहीं था,बल्कि कई मायनों में अधिक प्रेरणादायक था। मानो हर इशारा एक कहानी कह रहा हो—संघर्ष की,आत्मबल की और जीत की।कार्यक्रम में महिलाओं और पुरुषों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं, जिनमें प्रतिभागियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विजेताओं को प्रथम पुरस्कार 2000 रुपये, द्वितीय 1500 रुपये, तृतीय 1000 रुपये, चतुर्थ 500 रुपये और पंचम 250 रुपये के साथ अन्य आकर्षक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। पुरस्कार वितरण मुख्य अतिथियों एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा किया गया,जिससे प्रतिभागियों का उत्साह और दोगुना हो गया।संघ के सचिव अशोक एरन, कोषाध्यक्ष महेश गोयल सहित तेज सिंह, शिवराज राठौर, चंद्रेश मित्तल, गिरीश जैन, समीर हुसैन और भेरू शंकर जैसे सदस्यों की सक्रिय भूमिका आयोजन को सफल बनाने में अहम रही।संघ के सदस्य मुकेश शर्मा ने सागर मंथन को बताया कि यह आयोजन पिछले 20 वर्षों से निरंतर आयोजित किया जा रहा है, जिसमें नीमच, मंदसौर, इंदौर, चित्तौड़, रतलाम, अजमेर, भीलवाड़ा, उज्जैन, झाबुआ, जयपुर सहित कई स्थानों से सदस्य भाग लेने आते हैं।सबसे प्रेरणादायक पहलू यह रहा कि इनमें से कई सदस्य शासकीय सेवाओं में कार्यरत हैं और अपनी जिम्मेदारियों के बीच समय निकालकर इस आयोजन में शामिल होते हैं। यह दिखाता है कि वे “विकलांग नहीं, बल्कि सक्षम और स्वाभिमानी” हैं।दिनभर चली प्रतियोगिताओं और उत्साह से भरे माहौल के बाद शाम को पुरस्कार वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। लेकिन यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश बनकर उभरा—कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, अगर हौसले बुलंद हों तो हर खामोशी भी एक नई आवाज बन सकती है।

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