नीमच। महेन्द्र उपाध्याय। अफीम की खेती में अपेक्षित उत्पादन, गाढ़ता और मार्फिन प्रतिशत हासिल करने की चुनौती से जूझ रहे किसानों को अब वैज्ञानिक खेती की तकनीकों से जोड़ा जा रहा है। इसी उद्देश्य से केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो नीमच द्वारा बुधवार को टाउन हॉल में ‘अफीम फसल की उन्नत खेती एवं गुड एग्रीकल्चर प्रैक्टिसेज’ विषय पर किसान प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इसमें नीमच,जावद और मनासा विकासखंड के चयनित अफीम किसानों ने भाग लिया।प्रशिक्षण के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को भूमि चयन,उन्नत बीज,संतुलित पोषण,सिंचाई एवं जल प्रबंधन,खरपतवार नियंत्रण तथा रोग-कीट प्रबंधन से संबंधित वैज्ञानिक जानकारी दी। साथ ही फसल की गुणवत्ता और निर्धारित मानदंडों के अनुरूप उत्पादन हासिल करने के लिए आवश्यक सावधानियों के बारे में भी बताया गया।सागर मंथन शिविर को संबोधित करते हुए डिप्टी नारकोटिक्स कमिश्नर निखिल गांधी ने कहा कि अफीम किसान अपने पारंपरिक ज्ञान के साथ वैज्ञानिक शोध और आधुनिक तकनीकों को जोड़कर खेती करें तो उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। उत्पादन बढ़ने से किसानों की आय में वृद्धि होगी और अफीम से बनने वाली जीवनरक्षक दवाइयों के लिए भी पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध हो सकेगा।कृषि विज्ञान केंद्र नीमच के प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. सी.पी. पचौरी ने किसानों को अफीम की गुणवत्ता में सुधार के वैज्ञानिक पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कई बार किसानों को अपेक्षित उत्पादन तो मिल जाता है, लेकिन गाढ़ता अथवा मार्फिन प्रतिशत निर्धारित स्तर तक नहीं पहुंच पाता। सागर मंथन इसके पीछे पोषक तत्वों के असंतुलित प्रबंधन, जल प्रबंधन में कमी तथा कृषि रसायनों के अनुचित उपयोग जैसे कारण हो सकते हैं।उन्होंने कहा कि फसल में पोषक तत्वों की पूर्ति सही समय पर करना बेहद जरूरी है। आधार खाद के रूप में दिए जाने वाले उर्वरकों का उपयोग निर्धारित समय पर किया जाना चाहिए, ताकि पौधे उन्हें प्रभावी रूप से ग्रहण कर सकें। इसी प्रकार सिंचाई की प्रक्रिया भी वैज्ञानिक तरीके से अपनाना जरूरी है।डॉ. पचौरी ने किसानों को कृषि रसायनों के उपयोग में विशेष सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि किसी भी दवा या रसायन का उपयोग विशेषज्ञों की सलाह और निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही किया जाना चाहिए। गलत अथवा अनावश्यक रसायनों के इस्तेमाल से फसल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।उन्होंने बताया कि वर्तमान में अफीम लाइसेंस की पात्रता निर्धारण में गाढ़ता और अफीम उत्पादन जैसे मानकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। किसानों में मार्फिन प्रतिशत को लेकर बनी आशंकाओं के संबंध में उन्होंने कहा कि इस वर्ष जिले के किसानों ने बेहतर प्रदर्शन किया है और मार्फिन की गुणवत्ता भी अच्छी रही है। वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर किसान भविष्य में भी गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार कर सकते हैं।सागर मंथन शिविर में किसानों ने अपनी खेती से संबंधित विभिन्न जिज्ञासाएं वैज्ञानिकों और अधिकारियों के समक्ष रखीं,जिनका समाधान विशेषज्ञों ने किया। किसानों ने ऐसे प्रशिक्षण शिविर नियमित रूप से आयोजित किए जाने की आवश्यकता भी बताई,ताकि किसानों, विभागीय कर्मचारियों और वैज्ञानिकों के बीच बेहतर समन्वय बना रहे।अधिकारियों ने बताया कि किसानों से शिविर की उपयोगिता को लेकर फीडबैक भी लिया गया है।सागर मंथन किसानों की जरूरत और उपयोगिता को देखते हुए इस प्रकार के प्रशिक्षण शिविर आगे भी लगातार आयोजित किए जाएंगे। इससे किसानों को नवीन वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी मिलती रहेगी और वे अपने पारंपरिक अनुभव के साथ आधुनिक कृषि पद्धतियों को जोड़ सकेंगे।शिविर के दौरान किसानों को नशा मुक्ति की शपथ भी दिलाई गई। साथ ही पिछले वर्ष श्रेष्ठ उपज देने वाले किसानों को डिप्टी नारकोटिक्स कमिश्नर द्वारा सम्मानित किया गया।इस अवसर पर डीओओ लालाराम दिनकर,रविंद्र डोगरे, जे.पी. मीणा,कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. श्याम सिंह तथा कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर मंदसौर की डॉ. किरण सहित केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारी, वैज्ञानिक और बड़ी संख्या में अफीम किसान मौजूद रहे।